Friday, 6 April 2012

कशमकश...





तेरी हर बात पर मैं कितना ऐतबार करता हूँ 
नादाँ हूँ,या तू मुझसे अन्जान बनता हैं ?


 कभी तो देख डूबकर मेरी आखोँ मेँ हमनशीँ,
दीबाना हूँ,या तू मुझसे अन्जान बनता है  ?


मुझे मौका तो दे या कर ले फ़ना खुद मेँ,
बेसबर हूँ,या तू मुझसे अन्जान बनता है ?


तेरी इक इक अदा मेरी नज़रों मेँ क़ैद है,
आइना हुँ,या तू मुझसे अन्जान बनता है ?


तेरे कदमों की आहट से रौशन है मेरा नसीब,
ज़र्रा हूँ,या तू मुझसे अन्जान बनता है ?


खुदा कैसा मेहरबां है तेरी सादादिली पे भी,
वो तुझसा है या तू मुझसे अन्जान बनता है ?


- kumar

Friday, 13 January 2012

मेरा चाहने वाला....




अपनी  पलकों  से  मेरे  खाब सजाने  वाला,
गया  इक  रोज  मुझे  छोड़,मेरा  चाहने  वाला

तकती  आँखों  की  फिर  आज  तमन्ना  है  वही,
हँसे  फिर  आज  मुझ पर,मेरा  चाहने  वाला

वो  नाज़िर  था  मेरा,संगदिल  नहीं  यारों,
खून  ए  जिगर  को  लोटेगा,मेरा  चाहने  वाला

काश  जाते  हुये  वो  हुनर  भी  दे  जाता  मुझको,
जैसे  भूला  है  मुझको, मेरा  चाहने  वाला

हम  तो  पत्थर  हैं,रोयेंगे  तो  क्या  रोयेंगे, ?
बस  कोई  पत्थर  ना  फिर पाये,मेरा  चाहने  वाला

-kumar

Thursday, 5 January 2012

कब...???




कभी चुपके से सुन तो सही,
मेरी सदा...
तेरे कई ख़त लिखे हैं इसमें...
मैं हर रोज इक ख़त पढता हूँ,
खुद से नज़र बचाकर...
मगर...
हर ख़त के बाद,
दिल कुछ पूछ बैठता है...
वो कब आएगा....????

-kumar

Wednesday, 28 December 2011

ज़ुर्रत



आज वक़्त से आँखें मिला ही लीं,
और जान लिया वजूद को...
जिसके भरोसे...
अब तक पटकता रहा,
उम्मीदों के पैर...
वो भी झूठी तसल्ली सा निकला....

-kumar

Thursday, 15 December 2011

बदलाव...




आजकल  कोई  हँसकर नहीं  मिलता,
गले  मिलकर  भी  कोई  दिल  नहीं  मिलता 

किस  तरह  समेटा  है  तूफां ने  समन्दर  को,
कश्ती  को  डूबता  मुसाफिर  नहीं  मिलता 

वो  नादाँ है,इंसां  पे  ऐतवार  करता  है,
वक़्त  पड़  जाये  तो,ख़ुदा  भी  नहीं  मिलता

एक  खलिश  उठती  है,तेरी हर बात से,दिल में,
मेरी चाहतों को दर्द का आलम नहीं मिलता 

आसमां  को  छू  रहे  हैं,पत्थरों  के  मकां,
बच्चों  को  अब  खेलने, मैदां  नहीं  मिलता

माँ,तू सच कहती थी,नादान को प्यार मत करना,
दिल टूटेगा तो फिर कोई नादान नहीं मिलता

-kumar

Wednesday, 23 November 2011

कुछ और....



सोचा था कुछ और मंजिल कुछ और हो गई,
जिस महफ़िल  में हम गये,वही रुस्बा हो गई

राह ए मोहब्बत्त में,हमने निभाई हर सदा,
उनके लिए हर सदा,बस इक अदा हो गई

उम्र भर जिस हमसफ़र को कहते रहे हम शुक्रिया,
गौर से देखा तो साथ परछाई ही रह गई

उनके हर इक सितम को चुपचाप हमने सह लिया,
लेकिन हम पर सितम करना उनकी आदत हो गई

अपने लहू के रंग से लिखे थे कुछ यादों के गीत,
उन्होंने कर दी दुआ,और बरसात हो गई

-kumar

Tuesday, 1 November 2011

असर



अब वो मुझमें कमियाँ बताने लगा है,
चाहता है या फिर सताने लगा है ?

अजनबी थे तो दोनों तरफ जिंदगी थी,
अब वो हर बात अपने ढंग से बताने लगा है

कभी ये शर्त थी कि मुझे मेरे नाम से बुलाना,
अब वो सब नाम मुझे खुद से बताने लगा है

कुछ रोज तक खुदा सी इज्ज़त देता था मुझे,
अब वो प्यार से,मुझे पागल बताने लगा है

ये किस तरह का मर्ज़ पाल बैठे हो "कशिश"
अब वो हर दुआ बेअसर बताने लगा है

-kumar

जमीं पे कर चुके कायम हदें, चलो अब आसमां का रुख करें  - अरविन्द