Friday, 22 July 2011

माँ ....


एक अरसा हो गया माँ,
तेरे हाथ के मोटे मोटे रोट खाये हुए
वो गीले उपलों को जलाने की जद्दोजहद में
तेरे आंचल का गीला होना
अब भी याद है मुझे...

एक अरसा हो गया माँ,
सिर पर तेरा हाथ महसूस किये हुए
जो चादर तूने दी थी,
मेरे घर से चलते समय
उसकी तहें अब तक लिपटी पङी हैँ.....

एक अरसा हो गया माँ,
मुझे रोये हुए
अपने हाथों से मेरे आंसू पोंछते वक्त
ना रोने की इक कसम दी थी तूने,
वो अब तक सँभाल रखी है मैने.....

एक अरसा हो गया माँ,
खुदा को देखे हुए,
एक अरसे से मैं बस यूँ ही जी रहा हूँ माँ.....
kumar

44 comments:

Ravi Rajbhar said...

Rula diya na..
Sach maa to aisi hi hoti hi bas maa jaisi.

Ek dam dil me baith gai ye prastuti.... just abhi me maa se bat kar ke phone rakh kar hi apke blogg ko open kiya tha.

Bahut-2 badhai swikaren.

Ravi Rajbhar said...

Ek apil hi...

Mujhe lagta hi ROT ko ROTI kar dijiye..
tiping mistake ho gai hi...!

Abhar

Kailash C Sharma said...

बहुत मर्मस्पर्शी रचना..आँखें नम कर गयी..बहुत सुन्दर

kumar said...

शुक्रिया सर...

kumar said...

ravi ji....shukriya....

Rakesh Kumar said...

बहुत भावपूर्ण,अत्यंत मार्मिक
मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति के लिए आभार.

मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है.

Dr (Miss) Sharad Singh said...

अत्यंत हृदयस्पर्शी...आन्तरिक भावों के सहज प्रवाहमय सुन्दर रचना....

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

प्रिय बंधुवर अरविंद जी
नमस्ते !
बहुत भावुक रचना है आपकी , जो भावुक करने में समर्थ भी है ...
एक अरसा हो गया मां ,
तेरे हाथ के मोटे मोटे रोट खाये हुए
वो गीले उपलों को जलाने की जद्दोजहद में
तेरे आंचल का गीला होना
अब भी याद है मुझे...


इस कविता का अत्यधिक विस्तार संभव है ...
आने वाले , ज़िंदगी के तमाम अनुभव अभी बाक़ी हैं ...
और तब भी बहुत कुछ शेष रहेगा ...
यह विषय ही ऐसा है न !

# रवि राजभर जी आप निश्चित रूप से विशुद्ध शहरी होंगे :)
देहाती और ग्रामीण परिवेश से नहीं होंगे...
मोटे मोटे रोट पारिवारिक देशज शब्द है , मोटी ( thick ) रोटी के लिए ...

पुनः श्रेष्ठ रचना हेतु
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

-राजेन्द्र स्वर्णकार

sm said...

touching poem

shephali said...

बहुत ही मार्मिक रचना
पढ़ कर मुझे अपने चंडीगढ़ और देल्ही के दिन याद आ गए

"बहुत अजीब थे दिन वो
जब तुझ बिन जीना सीखा था
माँ पहली बार मैंने
आंसूं पीना सीखा था"

सदा said...

ना रोने की इक कसम दी थी तूने,

वो अब तक संभाल कर रखी है मैने ..

मां के लिये जब भी कुछ पढ़ा है मन भावुक हो जाता है ...

बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने ...बधाई ।

संजय भास्कर said...

maa ..... kahte poori srishti vatsalyamayi ho jati hai

संजय भास्कर said...

बेहतरीन भाव लिए रचना।
शब्‍द नहीं सूझ रहे... क्‍या लिखूं इस पर।
आपने तो रूला ही दिया।
एक बार फिर बेहतरीन।

रजनी मल्होत्रा नैय्यर said...

बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना अरविन्द जी ......और माँ तो ऐसे भी दिल के इतनी करीब होती है की वहां नमी आने ही आने हैं .......

kumar said...

रजनी जी बहुत बहुत शुक्रिया...

artijha said...

जब भी हृदय के दर्पण में भावनायें झाँकती है तो टूटे फूटे शब्दों को कलम के धागे में पिरोकर उनका श्रृंगार करने की कोशिश करता हूँ......बहुत खुबसूरत लिखा है आपने अपने बारे में...एक अरसा हो गया माँ,
मुझे रोये हुए
अपने हाथों से मेरे आंसू पोंछते वक्त
ना रोने की इक कसम दी थी तूने,
वो अब तक सँभाल रखी है मैने.....
...आपकी कबिता ने तो एक पल को रुला ही दिया....माँ...होती ही ऐसी है...उसके जैसा तो दुनिया में कोई नही है....आपकी कबिता लाजबाब है.....शयद पहली बार आई हु आपके ब्लॉग पे....अच्छा लगा.....

रेखा said...

कूट कूट कर भावनाए भर दी है आपने इस रचना में . आपने माँ को समर्पित करते हुए रचना लिखी है जो रचना को और भावना प्रधान बना रही है. सुन्दर रचना.

निवेदिता said...

बेहद भावुक कर जाती रचना .....

कुश्वंश said...

भावना प्रधान और सुन्दर रचना

Dr Varsha Singh said...

सुन्दर संवेदनशील अभिव्यक्ति...

वीना said...

बहुत मर्मस्पर्शी रचना...
बेहद खूबसूरत....
पहली बार हूं आपके ब्लॉग पर...अच्छा लगा...

Chandra Bhushan Mishra 'Ghafil' said...

माँ एक ऐसा पावन शब्द जिसके बड़प्पन के बारे में जो भी कहा जाय कम है...धन्यवाद ओर बधाई

anu said...

माँ को कोटि कोटि प्रणाम

vandana said...

पहले और आखिरी बंद ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया और सम्पूर्ण रचना में गांव की खुशबू है

Babli said...

मेरे ब्लॉग पर आने के लिए और उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिए आपका धन्यवाद!
बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!
मेरे इस ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com

Ravi Rajbhar said...

Kumar ji,
Sadar Namskar...
Agar ham apke kimati samay me se kux mange to milega???

yadi han
to please call kijiyega..
my cell no. 09453887323

blogg setting ke liye kux apse puchna hi.

Thanx

Anonymous said...

very touching ....chu liya dil ko

रश्मि प्रभा... said...

कोई नहीं भूलता माँ कोई नहीं भूलता .... तेरे हाथों की खुशबू रोटी में हुआ करती थी , तेरे हाथ के कौर में ...
बहुत ही अपनी सी रचना

सागर said...

maa ki sayad isse adhik khubsurat abhivaykti ho nhi sakti... sab kuch samet diya aapne....

veerubhai said...

माँ मेरी भी ऐसी ही थी कुमार साहब ,आँखों से कंडों को दहकाती .मेरी तेरी उसकी सबकी माँ ऐसी ही होती है साझा अनुभूति की कविता .

राकेश कौशिक said...

यही सोच बनी रहे - शुभकामनाएं और आशीष

shalini kaushik said...

bahut sundar bhavon ko shabdon me piroya hai aapne kumar ji.badhai

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

हृदयस्पर्शी .....

shalini kaushik said...

kumar ji aapke blog ko ye blog achchha laga par liya hai ,aakar anugrahit karen

चैतन्य शर्मा said...

प्यारी सी कविता ...माँ से अच्छा तो कुछ भी नहीं होता ....

S.N SHUKLA said...

बहुत सुन्दर रचना, बहुत सुन्दर प्रस्तुति , एक सन्देश देती हुयी , आभार

कृपया मेरे ब्लॉग पर भी आयें

Babli said...

मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

smshindi By Sonu said...

बेहद खूबसूरत कविता

मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है.

shikha kaushik said...

kumar ji -bahut sundar bhavabhivyakti prastut ki hai aapne .badhai .

sunita upadhyay said...

bahut sundar rchana

SAJAN.AAWARA said...

bahut achi lagi apki ye rachna....aaj se hi apko follow kar raha hun....
jai hind jai bharat

कविता रावत said...

एक अरसा हो गया माँ,
मुझे रोये हुए
अपने हाथों से मेरे आंसू पोंछते वक्त
ना रोने की इक कसम दी थी तूने,
वो अब तक सँभाल रखी है मैने.....
...MAA hi to sachi hamdard hoti hai, uske aalawa kisi ke aage rona jo bemani hai...bahut achhi panktiyan..
एक अरसा हो गया माँ,
खुदा को देखे हुए,
एक अरसे से मैं बस यूँ ही जी रहा हूँ माँ.....
..sach khuda ko kisne dekha MAA ko dekh liya to khuda apne aap mil gaya..
..Maa ko samparpit marmsparshi rachna ke liye aabhar!

कविता रावत said...

Aapke blog par aakar bahut achha laga..
Haardik shubhkamnayen!

Zindagi said...

nishabd ho gayi mai....ek sher yaad aa gayaa...kahi suna tha maine..

kisi ke hisse mein makan aaya...
kisi ke hisse mein dukan aayi....
mai ghar mein sab se chhota tha...
mere hisse mein maa aayi......

जमीं पे कर चुके कायम हदें, चलो अब आसमां का रुख करें  - अरविन्द