Thursday, 19 May 2011
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जमीं पे कर चुके कायम हदें, चलो अब आसमां का रुख करें - अरविन्द
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कुछ पल तो हँसने दे मुझे,ना उदास कर तू घर जाने की बातें,ना बार बार कर दो लम्हे बीते होंगें,साथ बैठे हुए तू सदियो...
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तेरे बारे में सबको बताऊँगा कैसे ? ज़ख्म दिल में बसे हैं,दिखाऊँगा कैसे ? तू बेवफा तो नहीं था जो वादे से मुकर गया, मगर ये सच ज़...
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क्या मज़ाक चल रहा है परिंदों के बीच, आसमां को दौड़ का मैदान बना रखा है बड़ी हसरत थी उसे टूटकर बरसने की, मगर हौँसले ने उसे ...
7 comments:
arvind sahab main yeh jana chahati hoon ki jab yeh nazm aap ne likhi toh ky soch kar lekhi?
pata nahin aapko kaisi lagi ???
lekin wo sham kuchh alag thi baki se........
kaash wo lamha lakar men
teri hatheli par saja pata
aur tujhe mahsus hota ki
is lamhe ne meri jindgi ke maayane hi badal diye.........
विजय दशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
कल 07/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
छिपते सूरज का पीछा करना अपने आप में महती भावना है. सुंदर.
वाह ...बहुत खूब ।
ये शाम भी अजीब है....
बहुत ही सुन्दर....
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