Friday, 25 January 2013

पुरानी डायरी से...(मई,2008)




इस क़दर चाहा उसे दुश्मन ज़माना हो गया ,
जो सितारा था बुलंद,गर्दिशों में खो गया

किसको पूछें राह अब,किससे कहें हाल-ए-दिल,
जो शहर रोशन कभी था,आज वीरां हो गया

जिस ख़ुदा के सामने कसमें उठायीं प्यार की,
वो भी हिम्मत हार कर गुमशुदा सा हो गया

ऐ जहां के दुश्मनों,कोई ज़ख्म ताज़ा दो हमें,
उनकी खातिर ज़ख्म सहना अब पुराना हो गया 

है असर क्या इश्क का,इतिहास लेकर देखिये,
ज़ुल्म करने वालों को भी नाम हासिल हो गया 

- कुमार 

Thursday, 10 January 2013

शोर...



क्या वक़्त है...!!
हर शख्स बदलाव चाहता है...
बगावत से या अहिंसा से,
शब्दों से या बातों से
मगर चाहते सब हैं...
कोई चाहता है सत्ता बदलना...
कब कॉंग्रेस जाये और बी० जे० पी० आये...
किसी को चिढ़ है बिहारी से,बंगाली से,
कोई धर्म की पताका फहरा रहा है....
कि हिन्दू सलामत रहें,मुस्लिम मिट जाएँ...
कहीं भाषा की लड़ाई है,
कि हिन्दी पिछड़ रही है...
कहीं जाति का रोना है....
मैं ठाकुर,तू चमार
कोई आसाराम का पुजारी है तो रविशंकर का दुश्मन....
कोई मंदिर चाहता है,मस्जिद तोड़कर....
कोई औरत को आँखों से उघाड़ रहा है,
कोई ढाँकने की दुहाई दे रहा है...
हाँ माना,
कि हम हर पल,हर बात पर बंटे हुए है....
पर हमारे यहाँ,
"अनेकता में एकता" का ढोंग जो हैं..
सो हम सब बदलाव चाहते हैं...
अपनी अपनी सहूलियत के हिसाब से,
हर चीज में...
सिवाय मानसिकता के...

-कुमार 

Monday, 24 December 2012

अब उठो



अब उठो पथिक संहार करो
जो आगे आये वार करो 
आँखों में भर लो अंगारे 
और हुँकारों से बात करो 

ये वक़्त नहीं चुप रहने का 
ये वक़्त नहीं सब सहने का 
जो सत्तारस में डूबे हैं 
उनकी गर्दन पे धार धरो 
अब उठो पथिक संहार करो...

बहरों को शोर सुनाई दे 
चहुँ ओर ये आग दिखाई दे 
जो मासूमों का दमन करे 
उस बल को तार तार करो 
अब उठो पथिक संहार करो...

- kumar

Monday, 17 December 2012

तलाश



हजारों लोग तो देखे मगर इन्सां नहीं देखा,
कहीं मासूमियत में लिपटा बच्चा नहीं देखा 

ये कौन लोग हैं तलवारें लिए हुये ?
मैने खून का प्यासा कोई मज़हब नहीं देखा

उसके गुलामों में,बदनाम थे बहुत,
हर पल यही कहना तुमसा नहीं देखा

कई बार खायी  है विश्वास की ठोकर,
जिसपे भरोसा था संग नहीं देखा 

कितने सवेरे हो गये जागते हुये ?
आँखों ने उसका कोई सपना नहीं देखा 

- kumar 


Saturday, 8 December 2012

अधूरी बातें...



(1)
कफ़न ओढ़े 
सड़क पर सोता 
भूखा पेट...

(2)
एक ज़िन्दगी में 
रोजाना होतीं 
हज़ारों मौतें...

(3)
तुम न आओ 
पेश मुझसे 
मेरे अपनों की तरह...

(4)
खंजर से 
अमन की बातें 
करते सफेदपोश...

(5)
हर रोज 
तनख्वा गिनता 
नौकरीपेशा...

- kumar 

Monday, 3 December 2012

ज़िद...




चल देखते हैं अब तेरी अदा  क्या है ?
ये बन्दा  फिर बतायेगा  मेरी रज़ा  क्या है 

तू अपनी बात पर रहना,मैं अपनी जिद पे कायम हूँ,
ये मसला हल तभी होगा,वरना मज़ा क्या है ?

बहुत आये और आयेंगे मगर हमसा ना आयेगा ,
बेबस सी तेरी नज़रें ये सोचें माजरा क्या है ?

तेरी नाकामियों के किस्से हम सबको सुनायेंगे,
तुझ बेअदब की इससे और बेहतर सज़ा क्या है ?

- kumar 


Wednesday, 17 October 2012

ख़ामोशी...




वो घिसटते कदमों से आ तो गया,
बन्द पलकों से देखता  भी रहा....
सिले लबों  से कहा भी बहुत कुछ....
मैं तिनका तिनका तोड़ता रहा,
वो लम्हा लम्हा गिनता रहा...
वक्त ए रुखसती पर बड़ा बेसब्र लगा,
पर जाते कदम इक बार भी न पलटे....
शायद एक और मुलाकात बाकी थी कहीं.... 

- kumar

जमीं पे कर चुके कायम हदें, चलो अब आसमां का रुख करें  - अरविन्द