Wednesday, 1 August 2012

हाइकू......



(१)
कूड़े का  ढेर
ढूंढ़ता बचपन
मासूम बच्चा

(२)
तुम  और  मैं
बगावती   दुनियाँ 
लड़ेंगे  कैसे  ?

(३) 
चार  दीवारी 
उम्र  भर  की  कैद 
बेबस  खुदा

(४)
सब  पराये 
तुमसा  नही  कोई 
मेरा  अपना 

(५)
दंगे  फ़साद 
हर  सुबह  ऐसी 
बीरानी  रात

- kumar 

Saturday, 14 July 2012

अधूरी बातें...




()
भूखे बच्चे को
थपकियों से बहलाता,
सूखा  आँचल....

()
लड़ रहा हूँ
अपनों में रहकर 
अपनों से...

()
बढ़ जाती है
हर रिश्ते की बोली
बुरे वक़्त में...

()
और पिलाओ मुझे
दिल खाली है
जाम नहीं...

()
ये वक़्त
क्या आज भी वही है
जो तब था...

()
मज़हबी लोग
करते बँटवारा
मासूम खुदा का...

()
अधखुली आँखें
तेरा खयाल
अब क्या करूँ...?


- kumar 

Wednesday, 4 July 2012

अधूरी बातें...




(१)
असर ए  इश्क को
अश्कों से धोता
सिरफिरा आशिक़....

(२)
वक़्त सी झुर्रियां
कहती कहानी
मेरे चेहरे पे...

(३)
टीस
बढ़ सी जाती है
तुझे मिलकर...

(४)
तुझे चाहूँ
या ना चाहूँ
बड़ी उलझन...

(५)
अरसे बाद
तेरा मिलना
ज़ख्म खिल उठे...

- kumar

Saturday, 26 May 2012

कुछ मिले ना मिले...




कुछ मिले  ना मिले,उसके आंचल में छाँव मिले,
जन्नत मिली.जो मुझे माँ के पाँव मिले

बदल सा गया हूँ शहर में रहते रहते,
अब दोस्त मिले तो गाँव सा बफादार मिले

अजब हाल है कि वक़्त नही मरने को,
ज़िन्दगी कभी तुझे भी मेरा ख़याल  मिले

चलो एक बार फिर दिल पे पत्थर रख लें,
अदब से बोलें,गर वो मुस्कुरा के मिले

फ़र्ज़,ईमान,रूह,जमीर सब देखे बेचकर,
अब मिले तो कोई खुदा का खरीददार मिले

सच अच्छा है,मगर हर जगह बोला नहीं जाता,
ये वो तजुर्बे हैं जो हमें समाज से मिले

- कुमार 


Friday, 6 April 2012

कशमकश...





तेरी हर बात पर मैं कितना ऐतबार करता हूँ 
नादाँ हूँ,या तू मुझसे अन्जान बनता हैं ?


 कभी तो देख डूबकर मेरी आखोँ मेँ हमनशीँ,
दीबाना हूँ,या तू मुझसे अन्जान बनता है  ?


मुझे मौका तो दे या कर ले फ़ना खुद मेँ,
बेसबर हूँ,या तू मुझसे अन्जान बनता है ?


तेरी इक इक अदा मेरी नज़रों मेँ क़ैद है,
आइना हुँ,या तू मुझसे अन्जान बनता है ?


तेरे कदमों की आहट से रौशन है मेरा नसीब,
ज़र्रा हूँ,या तू मुझसे अन्जान बनता है ?


खुदा कैसा मेहरबां है तेरी सादादिली पे भी,
वो तुझसा है या तू मुझसे अन्जान बनता है ?


- kumar

Friday, 13 January 2012

मेरा चाहने वाला....




अपनी  पलकों  से  मेरे  खाब सजाने  वाला,
गया  इक  रोज  मुझे  छोड़,मेरा  चाहने  वाला

तकती  आँखों  की  फिर  आज  तमन्ना  है  वही,
हँसे  फिर  आज  मुझ पर,मेरा  चाहने  वाला

वो  नाज़िर  था  मेरा,संगदिल  नहीं  यारों,
खून  ए  जिगर  को  लोटेगा,मेरा  चाहने  वाला

काश  जाते  हुये  वो  हुनर  भी  दे  जाता  मुझको,
जैसे  भूला  है  मुझको, मेरा  चाहने  वाला

हम  तो  पत्थर  हैं,रोयेंगे  तो  क्या  रोयेंगे, ?
बस  कोई  पत्थर  ना  फिर पाये,मेरा  चाहने  वाला

-kumar

Thursday, 5 January 2012

कब...???




कभी चुपके से सुन तो सही,
मेरी सदा...
तेरे कई ख़त लिखे हैं इसमें...
मैं हर रोज इक ख़त पढता हूँ,
खुद से नज़र बचाकर...
मगर...
हर ख़त के बाद,
दिल कुछ पूछ बैठता है...
वो कब आएगा....????

-kumar

जमीं पे कर चुके कायम हदें, चलो अब आसमां का रुख करें  - अरविन्द