Tuesday, 19 March 2013

सच को शिकायत है...




सच को शिकायत है, कोई इधर नही आता,
मंहगाई इतनी है,सस्ता ज़हर नही आता

मैने जब भी कुछ मांगा,ख़ुदा ने झूठ ही बोला,
उसके इलाक़े में,मेरा घर नही आता

मेरी ग़लती फ़क़त इतनी है,कि मैं इंसां हूँ,
मुझको सियासत करने का हुनर नही आता

ये बुतपरस्तोँ का शहर है, बच्चे भूखे मरें तो मरें,
करोड़ों उस ख़ुदा पर चढ़ते हैं, जो नज़र नही आता

वालिद के तंज आज तक दिल में हैं मगर,
माँ रोती बहुत होगीबेटा घर नही आता

ये दुनियाँ बदल गयी है, या मेरी आँखों का तरजुमा, ?
जैसा बचपन में दिखता था, बैसा नज़र नही आता

- कुमार 

12 comments:

yashoda agrawal said...

आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 20/03/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

बहुत उम्दा गजल,,,

Recent Post: सर्वोत्तम कृषक पुरस्कार,

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

वाह...!
बहुत सार्थक प्रस्तुति!
आभार!

संध्या शर्मा said...

ये दुनियाँ बदल गयी है, या मेरी आँखों का तरजुमा, ?
जैसा बचपन में दिखता था, बैसा नज़र नही आता
बहुत बदल गई है ये दुनिया और दिन पर दिन बदलती जा रही है... सार्थक प्रस्तुति... आभार

मन्टू कुमार said...

Lajawab...

Madhuresh said...

Bahut achha likha hai bhai.. bahut shubhkaamnayen aapko!!

dr.mahendrag said...

ये बुतपरस्तोँ का शहर है, बच्चे भूखे मरें तो मरें,
करोड़ों उस ख़ुदा पर चढ़ते हैं, जो नज़र नही आता

bahut sundar gazal.

Pratibha Verma said...

मेरी ग़लती फ़क़त इतनी है,कि मैं इंसां हूँ,
मुझको सियासत करने का हुनर नही आता


बहुत सुन्दर ...
पधारें "चाँद से करती हूँ बातें "

Anju (Anu) Chaudhary said...

waah bahut khub ....एक अलग ही अंदाज़ है आज तो

Prakash Jain said...

Waah!!! Bahut sundar...

Malaya Pratap said...

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सुशील कुमार जोशी said...

वाह !

जमीं पे कर चुके कायम हदें, चलो अब आसमां का रुख करें  - अरविन्द