Sunday, 19 May 2013

क्या मज़ाक चल रहा है ?




क्या मज़ाक चल रहा है परिंदों के बीच,
आसमां को दौड़ का मैदान बना रखा है 

बड़ी हसरत थी उसे टूटकर बरसने की,
मगर हौँसले ने उसे बेकरार बना रखा है 

जो हँसता हुआ आया, उसे क़ातिल समझ बैठे,
याँ हर शख्स ने आहों से आस्तान सजा रखा है

मैँ घर गया तो माँ का आंचल न सूखेगा,
उन आँखों में बरसों से सब्र पला रखा है

वो इक रोज़ कुछ सोचकर फिर बदलेगा अपना फ़ैसला,
इसी उम्मीद ने इक लाश को इंसान बना रखा है

शहर में फिर कहीं इंसानियत नंगी हुई होगी,
शर्मिन्दगी ने कल से मुंह छुपा रखा है

-  अरविन्द 

Tuesday, 19 March 2013

सच को शिकायत है...




सच को शिकायत है, कोई इधर नही आता,
मंहगाई इतनी है,सस्ता ज़हर नही आता

मैने जब भी कुछ मांगा,ख़ुदा ने झूठ ही बोला,
उसके इलाक़े में,मेरा घर नही आता

मेरी ग़लती फ़क़त इतनी है,कि मैं इंसां हूँ,
मुझको सियासत करने का हुनर नही आता

ये बुतपरस्तोँ का शहर है, बच्चे भूखे मरें तो मरें,
करोड़ों उस ख़ुदा पर चढ़ते हैं, जो नज़र नही आता

वालिद के तंज आज तक दिल में हैं मगर,
माँ रोती बहुत होगीबेटा घर नही आता

ये दुनियाँ बदल गयी है, या मेरी आँखों का तरजुमा, ?
जैसा बचपन में दिखता था, बैसा नज़र नही आता

- कुमार 

Saturday, 16 February 2013

देखना है तो...



मेरी 50 वीं पोस्ट मेरे ब्लॉग पर...

देखना है तो फिर खुलकर तमाशा देखिये
जो नहीं मुझ पर यकीं तो आज़मा कर देखिये
गाँव से अच्छी लगी दिल्ली मगर बस चार दिन,
आइये इस शहर में कुछ दिन बिताकर देखिये
कोई भी अखबार लो ख़बरें वही सब एक सी ,
मार दी एक और बहू ज़िन्दा जलाकर देखिये
शर्म से, फाँसी लगाकर मर गयी इंसानियत,
वहशियों का हौसला बढ़ता यहाँ फिर देखिये
इश्क हमने भी किया था, जान पर बन आयी थी,
हो जरा भी हौसला, तब दिल लगाकर देखिये
-कुमार

Saturday, 9 February 2013

बहुत बहुत मुबाऱकबाद ...





आज हमारी शादी की पहली सालगिरह है । ''Mrs. निर्मला कुमार '' शादी की पहली  सालगिरह की बहुत बहुत मुबाऱकबाद । तुम्हारे साथ ये एक साल लड़ते-झगड़ते,प्यार करते यूँ ही बीत गया,बाकी सारी ज़िन्दगी भी यूँ गुज़र जायेगी...बस तुम मेरा हाथ यूँ ही थामे रखना...हमेशा...


फिर आज शिद्दत से मुझे दीदार करने दे ज़रा,
तू देखता रह चाँद को,मुझको मचलने दे ज़रा

कोई नई अदा ईजाद कर मेरी नज़र की सेज पर,
आज एहसासों को रात भर बात करने दे ज़रा

कुछ देर तक तू भूल जा इन बन्धनों के शौक को,
मुझको हदों से परे मिटकर सिमटने दे ज़रा

हर शम्मा को बेनूर कर,रौशन बना ले चश्म को,
ताउम्र मैँ जलता रहूँ,ऐसे पिघलने दे ज़रा

सदियों तक सुनते रहें दोनो दिलों की धड़कनें,
ना कोई बात तू करे,ना बात करने दे ज़रा

-कुमार


Friday, 25 January 2013

पुरानी डायरी से...(मई,2008)




इस क़दर चाहा उसे दुश्मन ज़माना हो गया ,
जो सितारा था बुलंद,गर्दिशों में खो गया

किसको पूछें राह अब,किससे कहें हाल-ए-दिल,
जो शहर रोशन कभी था,आज वीरां हो गया

जिस ख़ुदा के सामने कसमें उठायीं प्यार की,
वो भी हिम्मत हार कर गुमशुदा सा हो गया

ऐ जहां के दुश्मनों,कोई ज़ख्म ताज़ा दो हमें,
उनकी खातिर ज़ख्म सहना अब पुराना हो गया 

है असर क्या इश्क का,इतिहास लेकर देखिये,
ज़ुल्म करने वालों को भी नाम हासिल हो गया 

- कुमार 

Thursday, 10 January 2013

शोर...



क्या वक़्त है...!!
हर शख्स बदलाव चाहता है...
बगावत से या अहिंसा से,
शब्दों से या बातों से
मगर चाहते सब हैं...
कोई चाहता है सत्ता बदलना...
कब कॉंग्रेस जाये और बी० जे० पी० आये...
किसी को चिढ़ है बिहारी से,बंगाली से,
कोई धर्म की पताका फहरा रहा है....
कि हिन्दू सलामत रहें,मुस्लिम मिट जाएँ...
कहीं भाषा की लड़ाई है,
कि हिन्दी पिछड़ रही है...
कहीं जाति का रोना है....
मैं ठाकुर,तू चमार
कोई आसाराम का पुजारी है तो रविशंकर का दुश्मन....
कोई मंदिर चाहता है,मस्जिद तोड़कर....
कोई औरत को आँखों से उघाड़ रहा है,
कोई ढाँकने की दुहाई दे रहा है...
हाँ माना,
कि हम हर पल,हर बात पर बंटे हुए है....
पर हमारे यहाँ,
"अनेकता में एकता" का ढोंग जो हैं..
सो हम सब बदलाव चाहते हैं...
अपनी अपनी सहूलियत के हिसाब से,
हर चीज में...
सिवाय मानसिकता के...

-कुमार