Monday, 27 June 2011

प्रेम


अब सब कुछ ओस की तरह लगता है,
सब नया,निर्मल,
अंकुरित होते पौधे जैसा...
एक ठहराव सा है...
ह्रदय के भँवर में उठने बाली,
भावनाओं की लहरें
अब असमर्थ हैं,
उम्मीद की दीवारों पर,
उस प्रतिध्वनि को उत्पन्न करने में,
जिसके शोर में भ्रमित होकर,
मैँ भटकता था इधर उधर...
जो मन रूपी पक्षी,
उन्मुक्त हो,
उड़ता था अनंत आकाश में,
वो अब लिपटा पड़ा है अस्तित्वहीन डाल से...
कल तक जो नकारता था हर अस्तित्व को,
आज वही,
निराकार का सृजन करने में लगा है...
यह कोई बदलाव नहीं है,
ना पुर्नजन्म है...
बस,
अब मेरे अंदर एक दीप जल उठा है,
प्रेम का...
कुछ बीज अंकुरित होने लगे है,
मिलन के...

-Kumar .

Thursday, 16 June 2011

नादान


मेरी परछाई को देखकर तू खफा हो गया
ऐ नादान सँभल,मुहब्बत की भी हद होती है

जाना है तो फिर क्यूँ पलटता है बार बार
ऐ नादान सँभल,मुङने की भी हद होती है

कुछ कहकर फिर से चमन में बहार ला दे
ऐ नादान सँभल,अदाऔं की भी हद होती है

मत सोच मेरी मैं तो सदियों से प्यासा हूँ
ऐ नादान सँभल,अश्क बहने की भी हद होती है

मेरे साथ कयामत तक ना चल पाया तो
ऐ नादान सँभल,कसम देने की भी हद होती है ।

kumar...

Monday, 13 June 2011

माँ ....

                                     
ये घर बीरान सा लगता है
खिलौनों की आहटों को नजर लगाई किसने
वो सह लेती है हर बात खामोशी से
अब मै बङा हो गया हूँ माँ के लिए


मेरे घर देर से आने पर भी नाराज नहीँ होती
अब याद रहता है उसे अपने खाने का वक्त
मेरी तनख्वा को कभी पूछा नहीँ उसने
अब मैँ अब बङा हो गया हूँ माँ के लिए


कितना दूर आ गया था सच करने ख्वाबों को
आज सबकुछ होकर बस ख्वाब नहीँ आँखों मेँ
वो वक्त,वो खिलौने,वो बचपना कैसे दूँ बापस
अब मैँ अब बङा हो गया हुँ माँ के लिए......

kumar

Friday, 10 June 2011

ज़ज्बात



नजर तेरी से टकराकर,नजर देखूंगा
तू मुझमें देख ले खुद को,मैँ तुझमेँ खुद को देखूंगा
बेशक मिटा दो जहन से आइने का भरम,
मैं अब डूबकर चेहरा तेरी आँखों मेँ देखूंगा




कोई है वहाँ पर,आबाज नहीं देता
बक्त भी अब मेरा साथ नहीं देता
तिनके तिनके पे तेरी बातों को लिखा था मैने
आज कोई जर्रा मुझे साज नहीं देता

-kumar



Saturday, 4 June 2011

खयाल



कितनी  बेरंग  थी,ये  जिंदगी  तुझसे  पहले,
अन्धेरों  में  बसा  था  बजूद मेरा 
समंदर  सी  प्यास  होकर  भी,
एक  बूँद  तक  मयस्सर  ना हुई  कभी,
साया  भी  हँसता था  हर  रोज  मुझपे 
फिर  एक,दिन  चुपके  से,
तेरी  पलकों  ने  कुछ  कहा 
और  अब  कुछ  ऐसे  चमक  उठे  है  मेरी  आँखों  के  जुगनू 
कि दिल  करता  है  दूँ  चुनौती  सूरज  को 
अब  कदम  नहीं  समझ  रहे  चाल  मेरी,
मोड़  ना  दूँ  कहीं  रुख  हवा  का 
तेरे  साथ  होश  भी  इस  कदर  है,
कि  खुद  से  भी  परे  हो  चला  हूँ  अब 
कुछ  तो  कह  दो  कि  संभल  जाऊं  मैं,
कि  यह  हकीकत   नहीं  बस  खाब  है 
कितनी  बेरंग..........

-kumar







Friday, 3 June 2011

कुछ बातें...


  • सेक्स ईश्वर की प्रार्थना की तरह है,यह एक उम्मीद से शुरू होता है और एक संतुष्टि पर समाप्त ।
  • ईश्वर ऐसा फ़नकार है जो हर पल अद्वितीय रचना को जन्म देता है ।
  • मैं लोगौं से इसलिए प्रेम करता हूँ क्योंकि मैं प्रेम का भूखा हूँ ।
  • दुनियाँ में ऐसा कोई पैमाना नहीँ है जो ह्रदय में बसे प्रेम की गहराई नाप सके। 
  • भय को साथ रखकर बदलाव की उम्मीद करना व्यर्थ है। 
kumar...

Thursday, 2 June 2011

खयाल


मुद्दतों से ये आँखैं ख़्वाब में थीँ 
कि कभी आकर तू 
इन सिलबटों की बानगी पूछेगा
लेकिन सरे बाज़ार तूने
इस तरह किया बेपर्दा मुझे
कि हय़ा के खरीददार भी मुँह छुपाते नजर आये........

kumar...